ख़ामॊशी


ख़ामॊशी से तेज़ चीख कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बढ़कर ज़ुबान कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बुलन्द पैग़ाम कोई नहीं ।

 

ख़ामॊशी एक भाषा है – रूठने की, ख़फ़ा हो जाने की,

ख़ामॊशी एक अदा है – अपने हठ को मनवाने की ।

सच कहूँ तो ख़ामॊशी से बड़ी सज़ा कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बढ़कर ज़ुबान कोई नहीं ।

 

ख़ामॊशी में शक्ति है, ख़ामॊशी में सत्य है,

ख़ामॊशी में आँसू हैं, ख़ामॊशी में दर्द है ।

ग़म में ख़ामॊशी से बड़ी जिरह कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बढ़कर ज़ुबान कोई नहीं ।

 

ख़ामॊशी ही तो जीवन की आख़िरी सच्चाई है,

ख़ामॊशी में तो तुमने और मैंने पनाह पाई है ।

ख़ामॊशी से आगे अब मुकाम कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बुलन्द पैग़ाम कोई नहीं ।

 

सच है कि एक दिन ख़ामॊश ही हो जाना है – तुमने, मैंने, हम सबने ॥

 

– अभिमन्यु

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About Mad Crazy Hatter

Well, honestly the world ain't such a dull place after all. There are queer new developments happenin' everyday. I'm just one crazy fella who loves to observe, ridicule and dissect the craziness called life.

Posted on September 17, 2011, in Poetry. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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