Category Archives: Poetry

क़ाफ़िर

ग़िला1 नहीं कोई, जलन नहीं, बस कौतूहल2 सा उठता है,

इतनी ग़र्दिशों3 में रहकर भी कैसे वो मुस्काते हैं,

मेरे क़ुफ़्र4 को हँसकर वो, नादानी यों कह जाते हैं ।

 

तेरे बताए रस्तों पर भी वो ठोकर ही तो खाते हैं,

तेरी रहमत की यों आस लिए वो तार- तार हुए जाते हैं,

फिर भी मुफ़लिसी5 में वो बस तेरे ही गुन गाते हैं ।

 

स्याह-सफ़ेद नहीं हयात यह, हैं और कई रंग इसमें,

यह इल्म6 मुझे है फिर भी दिल में कुछ ख़्याल उठ जाते हैं,

लहू चूसकर मानवता का, हाजी वो बन जाते हैं,

और इन्सां के लिए मिटकर भी हम क़ाफ़िर ही कहलाते हैं ।

 

तुझसे बैर नहीं है मुझको, मज़हब से पर ख़फ़ा हूँ मैं,

नीयत को मज़हब के तराजू में तुलता देख ग़मज़दा7 हूँ मैं,

ईमान क्या इस क़दर मता-ए-मज़हब8 हो चुका है,

क्या फ़ितरत9 तोलने का हर साफ़ ज़रिया खो चुका है,

गर ऐसा है तो तेरे वजूद10 को मानने से इनक़ार करता हूँ,

अपने क़ाफ़िर होने का आज इक़रार11 करता हूँ ॥

 

– अभिमन्यु

 

“Kaafir” means one who is bereft of faith.

1- complaint; 2- curiosity; 3- misfortune; 4- lack of faith; 5- poverty; 6- knowledge; 7- sad; 8- the domain of religion; 9- nature; 10- existence; 11- accept

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ख़ामॊशी

ख़ामॊशी से तेज़ चीख कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बढ़कर ज़ुबान कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बुलन्द पैग़ाम कोई नहीं ।

 

ख़ामॊशी एक भाषा है – रूठने की, ख़फ़ा हो जाने की,

ख़ामॊशी एक अदा है – अपने हठ को मनवाने की ।

सच कहूँ तो ख़ामॊशी से बड़ी सज़ा कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बढ़कर ज़ुबान कोई नहीं ।

 

ख़ामॊशी में शक्ति है, ख़ामॊशी में सत्य है,

ख़ामॊशी में आँसू हैं, ख़ामॊशी में दर्द है ।

ग़म में ख़ामॊशी से बड़ी जिरह कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बढ़कर ज़ुबान कोई नहीं ।

 

ख़ामॊशी ही तो जीवन की आख़िरी सच्चाई है,

ख़ामॊशी में तो तुमने और मैंने पनाह पाई है ।

ख़ामॊशी से आगे अब मुकाम कोई नहीं,

ख़ामॊशी से बुलन्द पैग़ाम कोई नहीं ।

 

सच है कि एक दिन ख़ामॊश ही हो जाना है – तुमने, मैंने, हम सबने ॥

 

– अभिमन्यु